कुछ इस तरह बैठा हुआ हूँ……

कुछ इस तरह बैठा हुआ हूँ
सोच रहा हूँ,करने कितने काम।
इस मानव जन्म में क्या, ईश्वर ने न लिखा
क्या कभी कोई सुख-चैन, कभी आराम ?

निद्रा कि मुद्रा अब तो स्वर्ग-लोक से भी परे है
दौड़ – भाग का काम अब तो,
मानव  ही करे है।

कुछ इस तरह बैठा हुआ हूँ
सोच रहा हूँ , करने कितने काम।

जतन किये अनंत ही मानो
अंत न होए भला ‘काम’ यह जानो।
ढेरों उपचार,
मिला ज्ञानियो, विद्वानो से कई- कई बार।

भला एक भी मर्ज़ काम न आया
इस बेदर्दी ने मानो एक काम और भी बढ़ाया।

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