गुरुर – ए – इश्क़

कलम मेरी ताकत थी
दौलत तेरा गुरुर था ।
बिकते कहाँ हम जैसे मनचले
जानता भी तेरा दिल यह ज़रूर था ।

अल्फाज़ जो मेरे बिक न पाएँ
जाने कितने कौड़ियों के बोल लगाएँ
जो मुझे मंज़ूर था
न तुझे क़बूल था ।
तेरे इश्क़ का फ़ितूर फ़िज़ूल था
इश्क़ को तौलना बस तेरा कसूर था ।

शायद,
तुही मेरी ताकत थी
पर दौलत तेरा गुरुर था ।

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