दर्द कविता का !

एक मित्र ने बातों – ही- बातों में पूछ लिया
कवि जी आप क्या खाते हो ?
कविता में इतना दर्द कहाँ से लाते हो
न हुआ ब्याह, न ज़िन्दगी की परवाह
भावनाओं को कलम की भेंट क्यों चढ़ाते हो ?

हम बोले भईया,
ब्याह से भी बड़ी मुसीबत आन पड़ी है ।
प्रगति कर रहा आज समाज
फिर भी बीमारियाँ अनेक और लाइलाज़
कही भूख है, तो कही चोरी
कही अँधा कानून, तो कही घुसखोरी ।

एक छोटा- सा कवि हूँ
सोचता हूँ, शायद कलम से बदले समाज
कही टुकड़ों में जी रहा आज चंद सिक्कों का मोहताज़ ।

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