नज़र

ऐ वक़्त बुरी नज़र न लगाना
अब पिघलने की आदत कहाँ ।
वीरानगीयों में छुपे घाव
और धूप बिन छाव में
दर्द समाया गहरा था ।

आज साँसों और धड़कन का
जैसे मिलन एकाद हो गया
ऐ वक़्त तेरी रफ़्तार में
अँधेरा जैसे कहीं खो गया ।

ऐ वक़्त बुरी नज़र न लगाना
सख्सियत को तक़दीर से
फिर न आज़माना।

ऐ वक़्त बुरी नज़र न लगाना ।

Advertisements

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s