Happy Independence Day !

स्वतंत्रता और स्वराज क्या है ?
शायद इस पीढ़ी को न मालूम
गुलामी की ज़ंज़ीरो को भला
गले से लगाया ही था कहाँ ?

मौका देर ही सही आया है हाथ
चलो करे भारत निर्माण
जन – गण – मन के साथ ।

Pokemon Go !

Pokemon मेरे दोस्त कहाँ चल दिए थे चुपके – चुपके ख़ैर बुढ़ापे से पहले फिर मेरी गली आ गए । चलो, मिलते हैं फ़िर कही बीच बाजार या नुक्कड़ के पार मोबाइल में करूँगा अब तुम्हारा इंतज़ार ।

गुरुर – ए – इश्क़

कलम मेरी ताकत थी
दौलत तेरा गुरुर था ।
बिकते कहाँ हम जैसे मनचले
जानता भी तेरा दिल यह ज़रूर था ।

अल्फाज़ जो मेरे बिक न पाएँ
जाने कितने कौड़ियों के बोल लगाएँ
जो मुझे मंज़ूर था
न तुझे क़बूल था ।
तेरे इश्क़ का फ़ितूर फ़िज़ूल था
इश्क़ को तौलना बस तेरा कसूर था ।

शायद,
तुही मेरी ताकत थी
पर दौलत तेरा गुरुर था ।

दर्द कविता का !

एक मित्र ने बातों – ही- बातों में पूछ लिया
कवि जी आप क्या खाते हो ?
कविता में इतना दर्द कहाँ से लाते हो
न हुआ ब्याह, न ज़िन्दगी की परवाह
भावनाओं को कलम की भेंट क्यों चढ़ाते हो ?

हम बोले भईया,
ब्याह से भी बड़ी मुसीबत आन पड़ी है ।
प्रगति कर रहा आज समाज
फिर भी बीमारियाँ अनेक और लाइलाज़
कही भूख है, तो कही चोरी
कही अँधा कानून, तो कही घुसखोरी ।

एक छोटा- सा कवि हूँ
सोचता हूँ, शायद कलम से बदले समाज
कही टुकड़ों में जी रहा आज चंद सिक्कों का मोहताज़ ।

अातंकवाद की अांखें !

अातंकवाद की अाँखे देखो फिर खुल गई अाज़
वास्ता न लगे तुम्हारा रमज़ान की नमाज़ ।
गुफ़्तगू तो करते पहले ख़ुदा से एक दफ़ा
जो तूने दी सज़ा क्या ख़ुदा की थी रज़ा ।

कैसा खेल निराला !

Messi जी कृप्या फुटबॉल की दुनिया से न जाना
अपने चाहनेवालों को इतना न तरसाना ।
कोई गल नही जी अगली बार कर लेंगे गोल
बदनामी से नाम का आजकल रहा कहाँ मेलजोल ।

काला धन !

विदेशी तिजोरियाँ काले धन से मालामाल है
भारतीय रईसों पर उठ रहा सवाल है ।
सोने की चिड़िया लूट चल दिए अंग्रेज
धन वापसी से अब बाबूलोग न करना परहेज़ ।

BREXIT !!

सीमाओं का क्या सिर्फ लकीरे हैं
आज मिट गई
कल फिर खीच देंगे ।
दूरियां दिल का खेल हैं
न दिवालों का ।
वरना खुदा भी आज
टुकड़ो में कहीं
हर मुल्क में बिखरा होता ।