बदनाम इलेक्शनवा

चोरी, लूटपाट
बदनामी का पहनत लिबास है
फिर भी नेताजी कहत
होवत प्रदेश का विकाश है।

जाने कितनी हाथियों की मूरत
बदली न दलितों की सूरत
फिर भी बहनजी कहत रही
करत दिन- रात बेजोड़ प्रयास है।

कल भैय्याजी भी तनिक मूड में
फुके चुनाव प्रचार का बिगुल वा।
कहत रहिन
काम- काज जो किये इतने साल
वोट देना हमरा को
दिखाना है और भी कमाल।

कुछ समझ न आवत
एक कुआँ, दूजा खाई
कईसन होए हमार प्रदेश की भलाई।

नज़र

ऐ वक़्त बुरी नज़र न लगाना
अब पिघलने की आदत कहाँ ।
वीरानगीयों में छुपे घाव
और धूप बिन छाव में
दर्द समाया गहरा था ।

आज साँसों और धड़कन का
जैसे मिलन एकाद हो गया
ऐ वक़्त तेरी रफ़्तार में
अँधेरा जैसे कहीं खो गया ।

ऐ वक़्त बुरी नज़र न लगाना
सख्सियत को तक़दीर से
फिर न आज़माना।

ऐ वक़्त बुरी नज़र न लगाना ।

Happy Independence Day !

स्वतंत्रता और स्वराज क्या है ?
शायद इस पीढ़ी को न मालूम
गुलामी की ज़ंज़ीरो को भला
गले से लगाया ही था कहाँ ?

मौका देर ही सही आया है हाथ
चलो करे भारत निर्माण
जन – गण – मन के साथ ।

Pokemon Go !

Pokemon मेरे दोस्त कहाँ चल दिए थे चुपके – चुपके ख़ैर बुढ़ापे से पहले फिर मेरी गली आ गए । चलो, मिलते हैं फ़िर कही बीच बाजार या नुक्कड़ के पार मोबाइल में करूँगा अब तुम्हारा इंतज़ार ।

गुरुर – ए – इश्क़

कलम मेरी ताकत थी
दौलत तेरा गुरुर था ।
बिकते कहाँ हम जैसे मनचले
जानता भी तेरा दिल यह ज़रूर था ।

अल्फाज़ जो मेरे बिक न पाएँ
जाने कितने कौड़ियों के बोल लगाएँ
जो मुझे मंज़ूर था
न तुझे क़बूल था ।
तेरे इश्क़ का फ़ितूर फ़िज़ूल था
इश्क़ को तौलना बस तेरा कसूर था ।

शायद,
तुही मेरी ताकत थी
पर दौलत तेरा गुरुर था ।

दर्द कविता का !

एक मित्र ने बातों – ही- बातों में पूछ लिया
कवि जी आप क्या खाते हो ?
कविता में इतना दर्द कहाँ से लाते हो
न हुआ ब्याह, न ज़िन्दगी की परवाह
भावनाओं को कलम की भेंट क्यों चढ़ाते हो ?

हम बोले भईया,
ब्याह से भी बड़ी मुसीबत आन पड़ी है ।
प्रगति कर रहा आज समाज
फिर भी बीमारियाँ अनेक और लाइलाज़
कही भूख है, तो कही चोरी
कही अँधा कानून, तो कही घुसखोरी ।

एक छोटा- सा कवि हूँ
सोचता हूँ, शायद कलम से बदले समाज
कही टुकड़ों में जी रहा आज चंद सिक्कों का मोहताज़ ।